बीडीओ व जनसेवक पर गबन का मुकदमा
Posted On at by NREGA RAJASTHANमनरेगा की होगी सीबीआई जांच
रायपुर। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना में यदि भ्रष्टाचार हुआ तो प्रथम दृष्टया आपराधिक मंशा पाए जाने पर सीबीआई से जांच कराई जाएगी। गैर आपराधिक या सिस्टम की विफलता की चूक होने पर केंद्रीय मंत्रालय के अधिकारी जांच करेंगे। प्रतिकूल परिस्थितियों में कलेक्टरों की जिम्मेदारी भी तय की जाएगी।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने कलेक्टरों को हाल में जारी एक परिपत्र में यह स्पष्ट किया है कि मनरेगा के नियमों का कड़ाई से पालन नहीं किया गया तो योजना की राशि पर रोक लगा दी जाएगी। इसी से संबंधित धारा 27 (1) का कड़ाई से पालन करने कलेक्टरों से कहा गया है। योजना की राशि का अनुचित प्रयोग के संबंध में शिकायत मिलने पर कोई मामला बनता है तो शिकायत की जांच करवाई जाएगी।
जरूरी हुआ तो योजना की राशि भी रोक दी जाएगी। तय समय में इसके उचित क्रियान्वयन के प्रयास किए जाएंगे। केंद्रीय मंत्रालय के अफसरों के दौरों, केंद्रीय रोजगार गारंटी परिषद, राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी सदस्य, आडिट टीम, मीडिया रिपोर्ट के आधार पर क्रियान्वयन में विसंगति पाए जाने पर भी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
कलेक्टरों से कहा गया है कि अधिनियम के उल्लंघन तथा चूक के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ धारा 25 के तहत कार्रवाई करें। ऐसी परिस्थिति में केंद्र सरकार जरूरी होने पर धारा 25 (2) में दी गई शक्तियों का उपयोग करते हुए योजना की राशि पर रोक लगा देगी। इस दौरान योजना तथा बेरोजगारी भत्ते के भुगतान की राशि का वहन राज्य सरकार करेगी।
कड़ाई होगी इस तरह
> केंद्र सरकार स्वतंत्र सूत्रों से शिकायतों के बारे में पूछताछ करेगी।
> आरोपों की जांच कर रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजेगी कि वह दो हफ्ते में कार्रवाई करे।
> राज्य से कार्रवाई की रिपोर्ट मिलने पर केंद्र की स्क्रीनिंग कमेटी रिपोर्ट की जांच कराएगी।
> राज्य की रिपोर्ट संतोषजनक न होने पर सीबीआई या केंद्रीय मंत्रालय के अफसरों को जांच सौंपी जाएगी।
> सीबीआई जांच होने पर संबंधित अफसरों को मनरेगा से हटाकर स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
> यदि राज्य सरकार ऐसा नहीं करती तो योजना की राशि पर रोक लगा दी जाएगी।
> केंद्रीय अफसरों द्वारा की जा रही जांच होने तक भी राशि रोक दी जाएगी
> राज्य सरकार को तय अवधि में सिस्टम में सुधार करना होगा।
> राज्य सरकार के सुधार के उपायों से संतुष्ट होने पर केंद्र सरकार फिर से राशि जारी कर सकेगी.
Source: भास्कर न्यूज
अभी कागजी तौर पर ही सफल है मनरेगा
Posted On at by NREGA RAJASTHANज्यां द्रेज वरिष्ठ समाजविज्ञानी
मनरेगा को मैं सरकार ही नहीं देश की फ्लैगशिप योजना की तरह लेता हूं.
इस योजना को लेकर सरकार की अगंभीरता अक्सर झलक जाती है. बजट में मनरेगा को लेकर विरोधाभास दिखा. एक तरफ तो इस मद के लिए पिछले वित्त वर्ष से 100 करोड़ रुपए कम तय किए गए और दूसरी ओर सरकार ने यह भी कहा कि 100 दिनों वाली इस रोजगार योजना के तहत वेतन में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के अनुसार बढ़ोतरी की गई है. अब कम आवंटन से बढ़ी हुई जरूरत कैसे पूरी हो सकती है यह समझ से परे है. दरअसल सरकार कई गैर जरूरी मद में राशि बढ़ाने को हमेशा तैयार रहती है जबकि भारत का कायाकल्प करने में सक्षम इस योजना को लेकर पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखाती. यह अगंभीरता फंडिंग से लेकर योजना के कार्यान्वयन के तरीकों तक में दिखती है.
मेरा आकलन है कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस योजना से बेहतर शायद ही कोई योजना हो बल्कि मैं तो मानता हूं कि दुनिया में ही शायद इस जैसी कोई योजना हो. यह अगर ठीक से संचालित हो तो गरीबी मिटाने का महात्मा गांधी का सपना पूरा होने से कोई नहीं रोक सकता. लेकिन योजना का दुखदायी पहलू यह है कि यह कागजी तौर पर तो पूरी तरह सफल है लेकिन वास्तविक तौर पर नहीं. अभी देश के कई जिले ऐसे हैं जहां इस योजना से जुड़ी घोर अनियमितताएं सामने आ रही हैं. खासकर इसमें भ्रष्टाचार का जो इतिहास रहा है उस पर गौर करने की जरूरत है. कई लोग इसे अपनी अर्थव्यवस्था में मजबूती लाने के उपाय की तरह देख रहे हैं लेकिन कई ऐसे भी हैं जिनका प्रयास है कि इसे पूरी तरह पंगु बना दिया जाए. हमने देखा है कि योजना में भ्रष्टाचार को सामने लाने वाले कुछ जुझारू कार्यकर्ताओं की हत्या तक हुई और हत्यारों को पकड़ा भी नहीं जा सका.
मौजूदा बजट में इसके लिए भले ही कम राशि का प्रावधान हो, फिर भी इसके लिए तय राशि ईमानदारी से खर्च की जाए तो हालात बदल सकते हैं. वस्तुत: योजना को और राशि की तो जरूरत है लेकिन इससे कहीं अधिक जरूरी पारदर्शिता के इसके प्रावधानों को लागू करने की है. योजना को सुधारने के लिए सबसे जरूरी एक मजबूत शिकायत निवारण मशीनरी की स्थापना की है. मौजूदा स्थिति में केंद्र और राज्य सरकार इसके जवाबदेही संबंधी प्रावधानों को महत्व नहीं दे रही हैं. योजना बेरोजगारी, गरीबी और भुखमरी से राहत दिलाने में तभी कारगर हो सकती है जब इस पर अमल ठीक से हो और किसी किस्म की लापरवाही पाए जाने पर जुर्माने और दंडित किए जाने जैसी व्यवस्था भी सुनिश्चित हो. अभी केवल गिने-चुने मामलों में ही जुर्माना तय किया गया है जबकि अनियमितता एवं लापरवाही के मामलों का अंबार लगा है.
मजदूरी के भुगतान में विलंब पर मुआवजे का प्रावधान भले हो लेकिन इसका उल्लंघन खुद राज्य सरकारें कर रही हैं. नौकरशाह तो मनरेगा की चाबी अपनी हाथ में रखना चाहते हैं जो इस योजना की मूल मंशा के ही खिलाफ है. योजना में कई सकारात्मक बातें निहित है किंतु इसे भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से बचाए रखना होगा. नौकरशाहों को इससे जितना हो सके, दूर रखना होगा. इस योजना से भ्रष्टाचार को दूर किया सके इसके लिए इसमें सारे प्रावधान हैं. बस इसे ठीक से लागू किया जाना चाहिए. किसी भी किस्म की अनियमितता पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए.
कामगारों के जॉब कार्ड और उन्हें मिल रही मजदूरी की समय-समय पर जांच हो. समाज के जिस वर्ग के लिए यह योजना शुरू की गई थी, उसे इसका लाभ मिलना चाहिए. लोगों को अभी योजना की पूरी जानकारी ही नहीं है. वे नहीं जानते कि जॉब कार्ड में नाम कैसे दर्ज कराएं जाएं. तहसीलदार व ग्रामसेवक तक पूरी जानकारी से महरूम हैं. स्थिति बदलनी होगी. आखिर किसी भी अन्य विकास योजना की तरह इसका सबसे बड़ा दुश्मन भ्रष्टाचार ही है, इसे समझना होगा. केंद्र सरकार की जिम्मेदारी केवल योजना के संबंध में घोषणाएं करने की ही नहीं है बल्कि जमीनी तौर पर नियमों का कितना पालन हो रहा है, यह भी देखने की भी है.
source-www.samaylive.com प्रस्तुति: नीरज कुमार तिवारीछिने अधिकार लेने में ही रह गए सरपंच!
Posted On at by NREGA RAJASTHANमहानरेगा में लाखों की लागत से आईटी सेंटर स्वीकृ किए गए लेकिन एक का भी निर्माण पूरा नहीं हो पाया। गांवों की सरकारें पहले अपने स्तर पर ही टेंडर कर गांव का चहुंमुखी विकास कराती थीं। टेंडर करने का यह सिलसिला लंबे समय से ही चला आ रहा था। ग्राम पंचायत की योजनाओं के साथ-साथ महानरेगा के टेंडर भी सरपंच व ग्रामसेवक ही किया करते थे। ग्राम स्तर पर टेंडर करने से गांव के ठेकेदारों को भी रोजगार मिलता था। इधर, सरकार ने महानरेगा में भ्रष्टाचार की आड़ लेते हुए ग्राम पंचायतों से महानरेगा के टेंडर तो ग्राम पंचायतों से छीने ही, पंचायत की योजनाओं के लिए किए जाने वाले टेंडर भी छीनकर पंचायत समिति को दे दिए।
पंचायत समिति ने लंबी मशक्कत के बाद अपने स्तर पर ही टेंडर किए तो अलग-अलग सामग्री के अलग-अलग ठेकेदार हो जाने के कारण सामग्री ही समय पर सप्लाई नहीं कर पाए। आईटी सेंटर पर ठेकेदारों द्वारा घटिया सामग्री सप्लाई करने की भी सरपंचों ने शिकायतें ही लेकिन प्रशासन ने जांच करवाना मुनासिब ही नहीं समझा। सरपंचों ने अपने अधिकारी छीनने का जमकर विरोध किया, नतीजतन सरकार को झुकना पड़ा और 2 अक्टूबर को ग्राम पंचायतों को ही टेंडर करने के लिए स्वतंत्र कर दिया। लेकिन राज्य सरकार की विरोधाभासी व्यवस्था के कारण ग्राम पंचायतों द्वारा टेंडर करने के बाद भी वे अमल में नहीं आ पाए।
इसके पीछे वजह यह रही कि पंचायत समिति स्तर पर किए गए टेंडरों को निरस्त ही नहीं किया गया और ना ही ठेकेदारों को उनकी जमा राशि ही लौटाई। ऐसे में वर्तमान में दो-दो स्तर पर टेंडर प्रक्रिया हो गई और इन दोनों में से कम दर वाली फर्म से सामग्री खरीद नहीं करने पर वसूली का डर सताने लगा। इसकी वजह से सरपंचों ने सामग्री की खरीद ही नहीं कर पाई। टीएफसी व एसएफसी समेत अन्य योजनाओं में ग्राम पंचायत अपने स्तर पर काम करवाती है लेकिन पहले टेंडर का रोड़ा और बाद में टीएफसी की किश्त का उपयोग केवल हैंडपंप व बोरिंग करवाने में ही करने के लिए पाबंद करने के कारण वे अन्य कोई काम नहीं करवा पाए।
इसमें भी पीसांगन पंचायत समिति समेत कुछ अन्य स्थानों को डार्कजोन घोषित कर दिया गया। महानरेगा में भी केवल आईटी सेंटर के ही पक्के काम स्वीकृत किए गए। जिले में पिछले साल मार्च माह में 256 ग्राम पंचायतों में दस-दस लाख की लागत से आईटी सेंटर के काम स्वीकृत किए गए लेकिन दस माह बीत जाने के बावजूद टेंडरों के घालमेल में वह आधे-अधूरे ही पड़े हैं। अब ग्राम पंचायतों द्वारा किए गए टेंडर कब से अमल में आ पाएंगे, यह भी तय नहीं है। इन टेंडरों के लिए सरकार ने सरपंच व ग्रामसेवक पर विश्वास ना कर पूरी कमेटी बनाते हुए जेईएन व एकाउंटेंट को भी शामिल किया गया।
महानरेगा में गड़बड़ी के चलते मालातों की बेर के सरपंच गणपतसिंह व बोराड़ा के सरपंच रामसिंह चौधरी को जेल की हवा खानी पड़ी, वहीं जवाजा पंचायत समितियों में सरपंचों के नाम रिकवरी निकाली गई। गड़बड़ी के कारण ही महानरेगा में सरपंचों से मेट लगाने और श्रमिकों के नाम लिखने का अधिकार भी ग्राम पंचायतों से छीनकर पंचायत समिति स्तर पर दे दिया गया। यही वजह रही कि सरपंच अपने विश्वासपात्र को मेट तक नहीं बना पाए और विरोधी उन पर हावी रहे।
सरपंचों का एक साल यूं ही बरबाद हो गया। क्षेत्र का विकास नहीं कर पाए। पूरे साल टेंडरों को लेकर ही माथापच्ची करते रहे। अभी भी पंचायतों ने टेंडर कर लिए लेकिन वह अमल में नहीं आ पाए। पुराने टेंडर भी निरस्त नहीं हो पाए। - भूपेंद्र सिंह राठौड़, जिलाध्यक्ष सरपंच संघ
पंचायत क्षेत्र में कोई विकास नहीं करवा पाए। यहां तक की नालियों का निर्माण तक नहीं करा पाए। विकास नहीं होने से जनता सरपंचों को कोस रही है। आईटी सेंटर दिए तो राशि दी सिर्फ 4 लाख। अब कह रहे हैं पहले इसका हिसाब तो दो आगे की राशि देंगे, ऐसे में विकास तो ठप होगा ही, जाहिर है काम भी रुकेगा। - श्रीकिशन गुर्जर, सरपंच, न्यारा
महानरेगा : निजी कृषि भूमि पर भी होंगे काम
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गुड़गांव, : हरियाणा सरकार के ग्रामीण विकास, पर्यावरण व पंचायत विभागों के वित्तायुक्त एवं प्रधान सचिव पी. राघवेंद्र राव ने शुक्रवार को गुड़गांव मंडल के उपायुक्तों को बताया महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत अब निजी कृषि भूमि पर भी कार्य करवाए जा सकते है लेकिन वह कार्य ग्रामसभा, ग्राम पंचायत तथा जिला परिषद से अनुमोदित हो और उनकी प्रशासनिक व तकनीकी स्वीकृति लेने के बाद ही कराए जा सकेंगे। मनरेगा के क्रियांवयन की समीक्षा कतरे हुए उन्होंने बताया मनरेगा के तहत मोटे तौर पर कौन से कार्य निजी कृषि भूमि पर करवाए जा सकते है उनकी सूची तैयार की जा रही है। एक व्यक्ति की निजी कृषि भूमि पर अधिकतम 1,50,000 रुपये से पूरे होने वाले कार्य ही करवाए जा सकते है। उन्होंने कहा कि इस योजना के तहत किसी भी व्यक्ति को अपने गांव या आस-पास के क्षेत्र में साल में 100 दिन का रोजगार मुहैया करवाया जाता है। योजना के अन्तर्गत हरियाणा में दैनिक पारीश्रमिक में संशोधन करके 179 रुपये किया गया है जो पहले 141 रुपये था।
उन्होंने उपायुक्तों से कहा वह इस योजना को लोगों में ज्यादा से ज्यादा प्रचारित करने के लिए ग्रामीण क्षेत्र में शिविर लगवाएं। वित्तायुक्त ने कहा जिला स्तर पर विभिन्न विभागों जैसे लोक निर्माण, मार्केटिंग बोर्ड, हुडा, एचएसआईआईडीसी, बिजली निगम, सिंचाई, वन, जनस्वास्थ्य आदि द्वारा करवाये जाने वाले कार्यो में भी मानव श्रम से होने वाले कार्यो का अलग ब्योरा तैयार करवा कर उन्हे मनरेगा के तहत करवाएं। इसके लिए वे भी इन विभागों के प्रधान सचिवों के साथ चंडीगढ़ में विचार-विमर्श करेगे। उन्होंने यह भी कहा कि इन विभागों के अधिकारी उपायुक्त से अनापत्ति लेकर ही अपने विभागीय विकास कार्यो को मूर्तरूप देंगे। उन्होंने बताया इस योजना के तहत राजीव गांधी सेवा केंद्रों का निर्माण करवाया जा सकता है। पी. राघवेंद्र राव ने गुड़गांव मंडल के जिलों में ब्लाक व ग्राम पंचायत स्तर पर इन केंद्रों के निर्माण के बारे में रिपोर्ट तलब की।
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